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भारतीय इतिहास और संस्कृति की महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा हैं जातक कथाएँ : वक्ताओं

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रामकोला, कुशीनगर। लोकायत जन विकास केंद्र, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान एवं एसडीडीएस पीजी कॉलेज, रामकोला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सप्ताहव्यापी ‘बोधि पथ’ कार्यशाला का समापन जातक कथाओं पर परिचर्चा और कविता पाठ के साथ हुआ। कार्यक्रम में विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और पत्रकारों ने जातक कथाओं के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में ‘जातक कथाओं का मर्म : संदर्भ भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई।

परिचर्चा का शुभारंभ करते हुए प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि जातक कथाएँ केवल मनोरंजन या अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित पशुत्व को बुद्धत्व में बदलने की व्यावहारिक वैचारिक प्रक्रिया हैं। उन्होंने भरहुत और सांची स्तूपों पर ब्राह्मी लिपि में अंकित जातक दृश्यों तथा अजंता की गुफा संख्या-17 के भित्ति चित्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कथाएँ सदियों से भारतीय लोक चेतना का हिस्सा रही हैं। उन्होंने ‘सीहचम्म जातक’ और ‘बावेरु जातक’ का उदाहरण देते हुए इनके वैश्विक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला।

गाजीपुर से आए प्राध्यापक डॉ. निरंजन कुमार ने कहा कि जातक कथाएँ नैतिक और मानवीय मूल्यों की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इनमें ईमानदारी, दया, न्याय, विवेक और प्रज्ञा जैसे गुणों का महत्व प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि इन कथाओं में मानव और प्रकृति के संबंधों को सरल एवं बोधगम्य रूप में दर्शाया गया है।

बलरामपुर के हिंदी प्राध्यापक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा कि जातक कथाएँ विश्व की सबसे प्राचीन कथाओं में शामिल हैं और उनका प्रभाव विश्व की अनेक भाषाओं एवं साहित्यिक परंपराओं पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रो. सदानंद शाही बुद्ध के जीवन और दर्शन पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं और यह कार्यशाला उसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि जातक कथाओं के माध्यम से बुद्धकालीन समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। उन्होंने फल जातक, नाम सिद्धि जातक और वानरिंद जातक का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कथाओं का स्वरूप लोक साहित्य जैसा है और इनका प्रभाव भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व साहित्य पर भी पड़ा है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रामनरेश राम ने कहा कि जातक कथाओं को भारतीय इतिहास और संस्कृति की महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन कथाओं के माध्यम से प्राचीन भारत की व्यापारिक व्यवस्थाओं, मार्गों, सामाजिक संरचना और जनजीवन के अनेक पहलुओं को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जातक कथाएँ भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल धारा को अभिव्यक्त करती हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार चौधरी ने कहा कि भगवान बुद्ध ने समानता और सामाजिक न्याय का संदेश दिया तथा जातक कथाओं के माध्यम से उनके विचार जनसामान्य तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि जातक कथाएँ तत्कालीन समाज की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कविता पाठ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्रीधर मिश्र, जयप्रकाश नाटक, राणा प्रताप, ओंकार सिंह, राघवेन्द्र शाही, डॉ. चेतना पांडेय, शिवांगी गोयल तथा आकृति विज्ञा अर्पण ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कविता पाठ का संचालन आकृति विज्ञा अर्पण ने किया।

इस अवसर पर डॉ. जाह्नवी सिंह, सेवानिवृत्त प्राचार्य हरेन्द्र सिंह, बृजेश गोविंद राव सहित बड़ी संख्या में महाविद्यालय की छात्राएं, शिक्षाविद, साहित्य प्रेमी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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